येषां न विद्या — सुभाषित
येषां न विद्या — सुभाषित
येषां न विद्या — सुभाषित का स्पष्ट पाठ। श्रद्धा से पढ़ें और संबंधित पाठों से जुड़ें।
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येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ [चाणक्य नीति / 10 / 7]
इस संग्रह में पाठ सरल अनुच्छेदों में दिया गया है। अलग परंपराओं में शब्दों और पाठ-क्रम में अंतर मिल सकता है।
अर्थ व परिचय
यह सुभाषित विद्या, अनुशासन, सद्गुण और दान की महत्ता बताता है। इसका संदेश है कि जीवन का मूल्य केवल रूप या साधनों से नहीं, बल्कि ज्ञान और अच्छे आचरण से बढ़ता है।
रोमन लिपि उच्चारण में सहायता के लिए है। पारंपरिक संस्करणों और क्षेत्रीय पाठों में वर्तनी तथा शब्दों के अंतर मिल सकते हैं।
पारंपरिक भक्ति पाठ। पारंपरिक पाठों में क्षेत्रीय पाठांतर मिल सकते हैं। परिचय और पठन-सहायता भव तारिणी भक्ति द्वारा तैयार किए गए हैं।
मूल पाठ-संदर्भ